सिफरी मुख्यालय, बैरकपुर में "हिलसा संवाद: बंगाल की खाड़ी (बीओबीपी) के परिप्रेक्ष्य में" पर सैटेलाइट संगोष्ठी का आयोजन
23 मार्च, 2022
भाकृअनुप-केन्द्रीय अन्तर्स्थलीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सिफरी) मुख्यालय, बैरकपुर में 'हिल्सा संवाद पर एक उपग्रह संगोष्ठी: बंगाल की खाड़ी (बीओबी) के परिप्रेक्ष्य में' का आयोजन किया गया। यह सर्वविदित है कि बांग्लादेश का कुल हिलसा पकड़ में 70% से अधिक का योगदान रहता है और उसके बाद भारत और म्यांमार आते हैं। पर यह देखा जा रहा है कि भारत में पिछले कुछ दशकों में हिलसा के उत्पादन में तेजी से गिरावट आई है। इसलिए, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार और नॉर्वे के हिल्सा विशेषज्ञों के बीच वैज्ञानिक सूचना आदान-प्रदान के माध्यम से हिल्सा संरक्षण और प्रसार की दिशा में एक क्षेत्रीय नीति और प्रबंधन योजना विकसित करने के लिए संगोष्ठी की गई। कार्यक्रम के आरंभ में सिफरी के निदेशक, डॉ बि के दास ने सभी प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए पिछले पांच वर्षों से संस्थान की हिल्सा अनुसंधान गतिविधियों और पिछले दो वर्षों से राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) संबंधी गंगा नदी में हिल्सा पुनरुद्धार कार्यक्रम पर प्रकाश डाला। डॉ. दास ने कहा कि गंगा के ऊपरी क्षेत्र में हिल्सा पुनरुद्धार के लिए फरक्का बैराज में 55000 से अधिक हिल्सा मछलियों को छोड़ा गया है। हिलसा मछली के अभिगमन पथ के अध्ययन के लिए 2200 से अधिक वयस्क हिल्सा मछलियों को टैग कर छोड़ा गया है। इस अध्ययन में पाया गया कि हिलसा 5 दिनों में 225 किमी की दूरी तय कर सकती है। इसके अलावा, सिफरी हिलसा के शुक्राणु संरक्षण और सफल प्रजनन की संभावना पर काम कर रहा है। डॉ. दास ने सुझाव दिया कि हिलसा पुनरुद्धार के प्रभावी निगरानी और सफलतम परिणाम के लिए सरकार द्वारा एक 10 वर्षीय योजना का आरंभ किया जाना चाहिए।

प्रो. अब्दुल वहाब, सलाहकार, (वर्ल्डफिश), बांग्लादेश ने बांग्लादेश में हिल्सा की वर्तमान स्थिति और अन्तर्स्थलीय जल में इसके संरक्षण नीति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बांग्लादेश का वर्तमान हिलसा उत्पादन 690000 मीट्रिक टन/वर्ष है। बांग्लादेश में हिलसा पकड़ने की प्रतिबंध अवधि हर वर्ष 22 दिन (अक्टूबर-नवंबर) है और न्यूनतम 500 ग्राम वाली हिलसा पकड़ने की अनुमति है। बांग्लादेश में हिल्सा उत्पादन में जागरूकता की हिलसा संरक्षण में प्रमुख भूमिका है। डॉ. माइकल अकेस्टर, राष्ट्रीय निदेशक (वर्ल्डफिश), म्यांमार ने म्यांमार में हिल्सा मात्स्यिकी के प्रबंधन नीति पर प्रकाश डाला। डॉ. अकेस्टर ने बताया कि म्यांमार में 1.6 मिलियन हिल्सा पालकों में अधिकतर उद्यमी हैं और यहाँ हिल्सा की निषेचन अवधि अगस्त-सितंबर (विशेषकर सितंबर) में सबसे अधिक जबकि जनवरी-फरवरी और अप्रैल-मई में आंशिक तौर पर होता है। डॉ. एटल मोर्टेंसन, कनकावा, नॉर्वे ने सुझाव दिया कि हिल्सा पालन के लिए सामन मछली पालन संबंधी सूचनाओं को एक अच्छा विकल्प साबित होगा। डॉ. पी. कृष्णन, निदेशक बे ऑफ बंगाल प्रोजेक्ट (बीओबीपी), भारत ने हिलसा मात्स्यिकी प्रबंधन में बंगाल की खाड़ी परियोजना की भूमिका के बारे में बताया। डॉ. कृष्णन ने वैश्विक हिल्सा उत्पादन परिदृश्य और क्षेत्रीय दृष्टिकोण के लिए आवश्यक अनुसंधान गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया क्योंकि ये सभी देश बंगाल की खाड़ी से जुड़े हुए हैं। डॉ. बी.पी. मोहंती, सहायक महानिदेशक (अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी), भाकृअनुप, नई दिल्ली ने कहा कि हिलसा न केवल वसा और पयुफ़ा बल्कि प्रोटीन, घुलनशील विटामिन ए, डी, ई के और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भी बहुत समृद्ध है।

डॉ. मोहम्मद जलीलुर रहमान, वैज्ञानिक (इकोफिश II) वर्ल्डफिश, बांग्लादेश ने हिल्स संरक्षण नीति के साथ बांग्लादेश में हिलसा प्रजनन की सफलता में सुधार के लिए हर साल 22 दिनों में ब्रूड हिलसा प्रतिबंध अवधि के सफल कार्यान्वयन पर प्रकाश डाला। सिद्धो कान्हो विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर आशिम कुमार नाथ ने सुझाव दिया कि अवैध पोना मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध, मछली पकड़ने पर प्रतिबंध अवधि प्रवर्तन, और हिलसा अभयारण्य की घोषणा भारतीय नदियों के लिए हिलसा संरक्षण की दिशा कारगर उपाय साबित हो सकते हैं। डॉ. अर्नब बिस्वास, प्रबंध निदेशक, एलो आई हॉस्पिटल, कोलकाता ने हिल्सा के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व को प्रस्तुत किया। डॉ. के. के. वास, संस्थान के पूर्व निदेशक ने संगोष्ठी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिलसा मत्स्य संरक्षण और प्रसार में क्षेत्रीय दृष्टिकोण का विशेष महत्व है। दिनांक 23 मार्च 2022 को आयोजित इस संगोष्ठी में विशेषज्ञों, विद्वानों और छात्रों सहित 70 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।





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